Science to Supersize Understanding

चीनी प्रायोगिक संयंत्र इलेक्ट्रोलिसिस की ऊष्मा से मीठा पानी और हाइड्रोजन बनाता है

हाइड्रोजन बनाने से पहले समुद्री पानी का लवण हटाया जाता है; छोटा संयंत्र सौ दिन चला और 250 किलोवाट के बड़े संस्करण को भी परखा गया।

Fotografia ilustrativa de um eletrolisador exposto no Science Museum de Londres; não é o protótipo chinês descrito na matéria.
चित्र: The wub / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0 (https://creativecommons.org/licenses/by-sa/4.0/); foto ilustrativa, sem adaptação.

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SUPER SCI-Z संपादकीय विश्लेषण

समुद्री पानी से हाइड्रोजन बनाने का मतलब यह नहीं कि नमक सीधे इलेक्ट्रोड तक पहुंचे। चीन के डालियान इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल फिजिक्स के शोधकर्ताओं ने पानी के इलेक्ट्रोलिसिस को उसी प्रक्रिया की ऊष्मा से चलने वाले विलवणीकरण से जोड़ा है। प्रायोगिक प्रणाली हाइड्रोजन और मीठा पानी दोनों देती है। यह सीधे खारे पानी का इलेक्ट्रोलिसिस नहीं है, जिसमें इलेक्ट्रोड घिस सकते हैं और अनचाही प्रतिक्रियाएं हो सकती हैं।

क्षारीय इलेक्ट्रोलिसिस में बिजली पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में अलग करती है, जबकि ऊर्जा का कुछ हिस्सा कम तापमान की ऊष्मा बनता है। इस डिजाइन में कम दबाव पर समुद्री पानी को आसुत करने के लिए वही ऊष्मा लगती है, जिससे पानी कम तापमान पर वाष्पित होता है। संघनित भाप इलेक्ट्रोलाइज़र के लिए मीठा पानी देती है और अतिरिक्त उत्पाद भी बन सकती है। नमक एक सघन धारा में रह जाता है; उससे संसाधन निकालने की संभावना का मतलब यह नहीं कि ऐसी पुनर्प्राप्ति व्यावसायिक रूप से चल रही है।

चीनी विज्ञान अकादमी के अनुसार पहला 20 किलोवाट का पायलट सौ दिन चला। उसने प्रति घंटे 3.8 सामान्य घन मीटर हाइड्रोजन — मानकीकृत तापमान और दबाव पर बताई गई गैस की मात्रा — और 1.2 किलोग्राम मीठा पानी बनाया। 250 किलोवाट तक बढ़ाए गए संयंत्र में प्रति घंटे 48 सामान्य घन मीटर हाइड्रोजन और 31.6 किलोग्राम मीठा पानी मिला। ये उत्पादन दरें अलग-अलग प्रणालियों की हैं; सौ दिन का परीक्षण बड़े संस्करण की अवधि साबित नहीं करता। संस्थान की मूल चीनी घोषणा के मुताबिक बड़ा संयंत्र अगस्त 2024 में बना था और 40 दिन से अधिक चला। सितंबर 2026 की नई बात वैज्ञानिक विश्लेषण का प्रकाशन है, नई मशीन का उद्घाटन नहीं।

शोधकर्ताओं द्वारा बताई गई तुलना में संयुक्त प्रणाली की विद्युत दक्षता केवल मीठा पानी लेने वाले पारंपरिक क्षारीय इलेक्ट्रोलिसिस से 14.4% अधिक थी। यह अध्ययन के मापदंड में सापेक्ष सुधार है, 14.4% की निरपेक्ष दक्षता नहीं; न ही इससे लागत या उत्सर्जन में उतनी ही कमी सिद्ध होती है। शांग जियांग और सहकर्मियों का शोध 15 सितंबर 2026 को Nature Energy में आया और अकादमी का अंग्रेजी बयान अगले दिन प्रकाशित हुआ।

इस प्रगति में दो ज्ञात प्रक्रियाएं जोड़कर सामान्यतः बर्बाद होने वाली ऊष्मा का उपयोग किया गया है। प्रदर्शन ने परीक्षण की परिस्थितियों में बताई गई उत्पादन दरें और विद्युत तुलना दी हैं। विभिन्न समुद्री जल की गुणवत्ता के साथ आर्थिक व्यवहार्यता, खारी बची धारा का प्रबंधन और बड़े संयंत्र की आयु अभी स्थापित नहीं हुई है। हाइड्रोजन का उत्सर्जन कम तभी होगा जब बिजली का स्रोत भी उपयुक्त हो; उत्पादन दर अकेली इसका उत्तर नहीं देती। यह परीक्षणाधीन इंजीनियरिंग मार्ग है, समुद्र से सीधे हाइड्रोजन निकालता व्यावसायिक संयंत्र नहीं।

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मुख्य बिंदु

  • बेकार ऊष्मा समुद्री पानी का लवण हटाती है, इसलिए इलेक्ट्रोड को खारे पानी की जगह मीठा पानी मिलता है।
  • 20 किलोवाट पायलट सौ दिन चला; 250 किलोवाट संस्करण ने प्रति घंटे 48 सामान्य घन मीटर हाइड्रोजन और 31.6 किलोग्राम मीठा पानी बनाया।
  • विद्युत दक्षता में 14.4% का सापेक्ष सुधार लागत या उत्सर्जन में बराबर बचत या व्यावसायिक उत्पादन साबित नहीं करता।
मुख्य स्रोतChinese Academy of Sciences

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