पेप्टाइड तीव्र अम्ल में टिके, पर शुक्र पर जीवन अब भी नहीं मिला

तीन कृत्रिम अणु सांद्र सल्फ्यूरिक अम्ल में स्थिर और मुड़े रहे; निष्कर्ष संभावित रसायन का दायरा बढ़ाता है, जीवविज्ञान सिद्ध नहीं करता।

Vênus fotografado durante aproximação de uma missão espacial, com a cobertura global de nuvens visível.
चित्र: NASA, via Wikimedia Commons
SUPER SCI-Z संपादकीय विश्लेषण

शुक्र के बादल रासायनिक चक्की जैसे हैं: उनकी बूंदों में लगभग 98 प्रतिशत सल्फ्यूरिक अम्ल, यानी अत्यंत संक्षारक पदार्थ, होता है। फिर भी तीन पेप्टाइड—अमीनो अम्लों की छोटी शृंखलाएं, जिनसे प्रोटीन बनते हैं—इस माध्यम में कई सप्ताह साबुत रहे और व्यवस्थित त्रिआयामी आकार अपनाए। परिणाम ने ग्रह पर जीवन नहीं खोजा; इसका सीमित किंतु महत्वपूर्ण अर्थ यह है कि पृथ्वी के जीवविज्ञान से जुड़ी एक आणविक श्रेणी पहले असंगत मानी गई दशाओं में भी संरचना बचा सकती है।

मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) की Jia Yi Zhang ने Proceedings of the National Academy of Sciences (PNAS) में प्रकाशित लेख का नेतृत्व किया। Mei Hong, Sara Seager और Janusz Petkowski वरिष्ठ लेखक थे। MIT News में Anne Trafton की रिपोर्ट के अनुसार टीम ने HHQ, HHQ13 और K7 का परीक्षण किया; ये तीन कृत्रिम पेप्टाइडों के प्रयोगात्मक कोड हैं, जिनमें दो सात अमीनो अम्ल वाले और एक लंबा रूप है। यह छोटा आणविक नमूना संभावित प्रोटीन विविधता का प्रतिनिधि नहीं है।

दल ने न्यूक्लियर मैग्नेटिक रेज़ोनेंस स्पेक्ट्रोस्कोपी का उपयोग किया, जो परमाणु नाभिक के चुंबकीय गुणों से आणविक संरचना जानने की तकनीक है। सांद्र सल्फ्यूरिक अम्ल में तीनों पेप्टाइडों ने ओमेगा लूप बनाए, यानी यूनानी अक्षर ओमेगा जैसे मोड़ जो कुछ प्रोटीनों में मिलते हैं। प्रस्तावित व्याख्या में अम्ल के अणु लूप को थामते हैं और बहुत कम पानी हाइड्रोलिसिस—पेप्टाइड बंध तोड़ने वाली अभिक्रिया—को सीमित करता है। अध्ययन ने स्थिरता और आकार देखा, चयापचय, प्रतिकृति या जैविक कार्य नहीं।

स्पेन के La Razón में Ignacio Crespo की रिपोर्ट ने प्रीबायोटिक रसायन—जीवन से पहले की रासायनिक प्रक्रियाओं—और वास्तविक जीवन की सीमा स्पष्ट रखी। उल्कापिंड शुक्र के वायुमंडल में अमीनो अम्ल ला सकते हैं, पर प्रयोग ने वहां इन पेप्टाइडों की मौजूदगी या उत्प्रेरक क्रिया नहीं दिखाई। प्रमाण बताते हैं कि छोटे पेप्टाइड लगभग शुद्ध सल्फ्यूरिक अम्ल में टिक और मुड़ सकते हैं; वे शुक्र पर अतीत या वर्तमान के जीवों का समर्थन नहीं करते। महत्व यह है कि खगोलजीवविज्ञान में संभावित विलायकों का दायरा बढ़ता है; निर्णायक अनिश्चितता यह है कि लंबी संरचनाएं और जुड़े रासायनिक तंत्र वास्तविक बादलों में काम कर पाएंगे या नहीं।

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मुख्य बिंदु

  • तीन कृत्रिम पेप्टाइड 98 प्रतिशत सल्फ्यूरिक अम्ल में कई सप्ताह टिके।
  • उन्होंने ओमेगा लूप बनाए, पर कोई जैविक कार्य सिद्ध नहीं हुआ।
  • अध्ययन रासायनिक संभावनाएं बढ़ाता है; यह शुक्र पर जीवन का प्रमाण नहीं है।
मुख्य स्रोतProceedings of the National Academy of Sciences