इंजेक्शन और विशेष चश्मे से दृष्टिहीन प्रतिभागियों को वस्तुएँ ढूँढ़ने में मदद मिली
दस लोगों के शुरुआती परीक्षण में उपचार के बाद सात लोग पहले से हल्की रोशनी पहचान सके। यह साधारण दृश्य संकेतों तक सीमित उपलब्धि है, सामान्य दृष्टि की वापसी नहीं।
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दरवाज़ा ढूँढ़ने की शुरुआत अँधेरे में रोशनी का एक संकेत पहचानने से हो सकती है। उन्नत रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा के कारण दृष्टि खो चुके दस लोगों के शुरुआती परीक्षण में आँख में इंजेक्शन और विशेष चश्मे के मेल से सात प्रतिभागियों की रोशनी के प्रति संवेदनशीलता बढ़ी। कुछ लोगों ने चश्मा पहनकर किए गए कार्यों में वस्तुएँ और दरवाज़े भी ढूँढ़े। छोटे समूह में यह सरल दृश्य संकेतों की पहचान है, सामान्य दृष्टि की वापसी नहीं।
रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा वंशानुगत रोगों का समूह है जिसमें रेटिना की प्रकाश ग्रहण करने वाली कोशिकाएँ धीरे-धीरे नष्ट होती हैं। रेटिना आँख के पीछे का वह ऊतक है जहाँ दृश्य संकेतों की प्रक्रिया शुरू होती है। इन ग्रहणकर्ता कोशिकाओं के नष्ट होने पर भी कुछ रेटिनल गैंग्लियन कोशिकाएँ बच सकती हैं; वे आँख से जानकारी मस्तिष्क तक भेजती हैं। José-Alain Sahel, Stefan Futterknecht, Isabelle Audo और सहकर्मियों ने जाँचा कि क्या बची हुई कोशिकाओं को प्रकाश के प्रति संवेदनशील बनाया जा सकता है।
दल ने हर प्रतिभागी की कम देखने वाली आँख में वायरल वेक्टर पहुँचाया। यह कोशिकाओं तक आनुवंशिक निर्देश ले जाने वाला वाहक है। निर्देश मिलने पर कोशिकाएँ ChrimsonR नामक प्रोटीन बनाती हैं, जिसे लालिमा वाली रोशनी सक्रिय करती है। कोशिकाओं को प्रकाश के प्रति प्रतिक्रिया करने वाला प्रोटीन बनाने योग्य बनाने की विधि ऑप्टोजेनेटिक्स कहलाती है। चश्मे का कैमरा सामने का दृश्य लेता है; उपकरण उसे प्रकाश के पैटर्न में बदलकर उपचारित आँख में भेजता है। इसलिए जाँचे गए हस्तक्षेप में इंजेक्शन के साथ चश्मा और प्रशिक्षण भी शामिल हैं।
सरल शब्दों में: कैमरा सामने की चीज़ें दर्ज करता है, चश्मा उन्हें उपयुक्त रोशनी में बदलता है और बदली गई रेटिना कोशिकाएँ संकेत आगे भेजती हैं। इससे किसी वस्तु की जगह समझने में मदद मिल सकती है, लेकिन मस्तिष्क को साफ़ तस्वीर नहीं मिलती। एक माप प्रकाश की सीमा थी: दूसरी आँख ढकने पर पहचान में आने वाली सबसे हल्की रोशनी। वस्तुओं वाले कार्यों से अलग क्षमता जाँची गई।
The New England Journal of Medicine में प्रकाशित अध्ययन में दस में से सात प्रतिभागी पहले से हल्की रोशनी पहचान सके; उनकी संवेदनशीलता 2.0 से 62.3 गुना बढ़ी। छह लोगों का सुधार लघुगणकीय पैमाने पर 0.6 इकाई से अधिक था, यानी लगभग चार गुना संवेदनशीलता। विश्लेषण में इसे चिकित्सकीय रूप से अर्थपूर्ण सीमा माना गया। इस सीमा के लिए पुराने शोध का आधार था, लेकिन परीक्षण की योजना में इसे पहले से तय नहीं किया गया था। शोधकर्ताओं ने इलेक्ट्रोएन्सेफलोग्राफी से दृश्य प्रसंस्करण के संकेत भी दर्ज किए; यह मस्तिष्क की विद्युत गतिविधि का माप है।
PIONEER खुला परीक्षण था: प्रतिभागी और शोधकर्ता जानते थे कि कौन-सा उपचार दिया गया है, और यादृच्छिक रूप से चुना गया तुलना समूह नहीं था। मुख्य उद्देश्य सुरक्षा का आकलन था। शोधपत्र के सार में नौ लोगों में आँख से जुड़ी 34 प्रतिकूल घटनाएँ दर्ज हैं: 23 हल्की, दस मध्यम और इंजेक्शन के तुरंत बाद रेटिना की धमनी में एक गंभीर लेकिन अस्थायी रुकावट, जो कुछ मिनटों में दूर हो गई। Institute of Molecular and Clinical Ophthalmology Basel ने भी इसी अध्ययन पर बिना किसी व्यक्तिगत लेखक के नाम वाला संस्थागत वक्तव्य जारी किया; यहाँ अध्ययन का स्वरूप और आँकड़े Sahel और सहकर्मियों के शोधपत्र से लिए गए हैं।
इंजेक्शन और चश्मा मिलकर दिखाते हैं कि प्राकृतिक प्रकाश ग्रहणकर्ता कोशिकाओं के बहुत कम रह जाने पर भी रेटिना की बची हुई कोशिकाएँ कुछ सरल कार्यों के लिए उपयोगी दृश्य जानकारी पहुँचा सकती हैं। प्रमाण पढ़ने, चेहरों को पहचानने, सामान्य दृष्टि या रेटिना के दूसरे रोगों में असर को स्थापित नहीं करते। बड़े तुलनात्मक अध्ययन जाँचेंगे कि सुधार कितने समय रहता है, रोज़मर्रा के किन कामों में मदद करता है और यह कितनी सुरक्षित तरह से मिल सकता है।
मुख्य बिंदु
- दस में से सात प्रतिभागी हल्की रोशनी पहचान सके; छह विश्लेषण में इस्तेमाल सीमा से आगे पहुँचे।
- इंजेक्शन बची हुई रेटिना कोशिकाओं को आनुवंशिक निर्देश देता है; वे प्रकाश-संवेदी प्रोटीन बनाती हैं और चश्मा प्रकाश पैटर्न देता है।
- यह छोटा खुला परीक्षण मुख्यतः सुरक्षा के लिए था; इससे सामान्य दृष्टि सिद्ध नहीं होती।

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