एन्सेलाडस के महासागर जैसी दशाओं वाले परीक्षण में पृथ्वी का सूक्ष्मजीव बढ़ा
पृथ्वी की मीथेन बनाने वाली एक आर्किया उस घोल में बढ़ी जिसे शनि के बर्फ़ीले चंद्रमा के नीचे मौजूद महासागर की संभावित रासायनिक दशाएँ दोहराने के लिए बनाया गया था। समान क्षारीयता वाले तुलना-माध्यम में जीव की संख्या नहीं बढ़ी।

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पृथ्वी का एक सूक्ष्मजीव प्रयोगशाला में बनाए गए उस मिश्रण में बढ़ा, जिसे शनि के बर्फ़ीले चंद्रमा एन्सेलाडस के महासागर की रासायनिक दशाएँ दोहराने के लिए तैयार किया गया था। उतनी ही अधिक क्षारीयता वाले एक प्रयोगशाला माध्यम में यह जीव नहीं बढ़ा था। Science Advances में 25 सितंबर को प्रस्तुत यह अंतर दिखाता है कि अवयवों का यह संयोजन एक ज्ञात चयापचय को उन दशाओं में सहारा दे सकता है, जिन्हें पहले इस जीव के लिए बहुत कठोर माना जाता था।
एन्सेलाडस की बर्फ़ीली परत के नीचे एक खारा महासागर है, जो चट्टानी केंद्र के संपर्क में है। पानी और चट्टान की प्रतिक्रियाएँ हाइड्रोजन छोड़ सकती हैं, जो मीथेन बनाने वाले सूक्ष्मजीवों के लिए संभावित ऊर्जा स्रोत है। Cassini ने चंद्रमा से निकले पदार्थ में लवण, कार्बनिक यौगिक और जलतापीय गतिविधि के संकेत पाए थे; इन्हीं संकेतों के आधार पर शोधकर्ता प्रयोगशाला में महासागर की संभावित रासायनिक दशाएँ बना सकते हैं।
म्यूनिख के लुडविग मैक्सिमिलियन विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने यह प्रयोग किया; लेखकों में वैनेसा हेल्मब्रेख्ट भी शामिल हैं। उन्होंने पानी, लवण, कार्बोनेट और पिसी हुई चट्टान को मिलाकर क्षारीय दशाएँ तथा पानी और चट्टान के बीच हाइड्रोजन पैदा करने वाली प्रतिक्रियाएँ दोहराईं। शोधकर्ताओं ने उसमें Methanothermococcus okinawensis डाला। यह एक आर्किया है—कोशिका-नाभिक के बिना रहने वाला सूक्ष्मजीव, जिसे मूल रूप से जापान और ताइवान के बीच ओकिनावा गर्त में समुद्रतलीय गर्म जलस्रोतों के पास से अलग किया गया था। उसका चयापचय हाइड्रोजन और कार्बन डाइऑक्साइड का इस्तेमाल करता है, मीथेन बनाता है और प्रकाश पर निर्भर हुए बिना इसी प्रक्रिया से ऊर्जा पाता है।
उपलब्ध कार्बन डाइऑक्साइड की कम मात्रा एक बाधा थी, क्योंकि जीव को ऊर्जा प्राप्त करने वाले चयापचय के लिए भी यह यौगिक चाहिए और कोशिकीय पदार्थ बनाने के लिए कार्बन के स्रोत के रूप में भी। बर्लिन की फ़्री यूनिवर्सिटी द्वारा जारी प्रयोग के विवरण के अनुसार, अधिक pH और घुली हुई कार्बन डाइऑक्साइड की कमी वाले प्रयोगशाला माध्यम में वह नहीं बढ़ा। इसके विपरीत, एन्सेलाडस जैसी दशाओं वाले मिश्रण में pH 11 तक वृद्धि हुई—यह बहुत क्षारीय दशा है—और पानी व चट्टान की प्रतिक्रियाओं से मिले हाइड्रोजन का उपयोग कर मीथेन बनी। यह वृद्धि कई दिनों तक चले प्रयोगों में हुई; परिणाम केवल कोशिकाओं के जीवित बचे रहने तक सीमित नहीं था।
जीन की अभिव्यक्ति के विश्लेषण में घुली हुई कार्बन डाइऑक्साइड की कमी के प्रति प्रतिक्रिया दिखी। मिश्रण में घुले अकार्बनिक कार्बन की सांद्रता अधिक थी, लेकिन उसका बहुत छोटा हिस्सा कार्बन डाइऑक्साइड के रूप में उपलब्ध था। बढ़ती कोशिकाओं में कार्बन स्थिरीकरण के एक मार्ग की अभिव्यक्ति बढ़ी: यह प्रतिक्रियाओं का ऐसा क्रम है जो इस यौगिक के कार्बन को कार्बनिक पदार्थ में शामिल करता है। इस प्रतिक्रिया से कोशिकाएँ बेहद कम सांद्रता पर भी कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग कर सकीं। इस तरह अध्ययन ने देखी गई वृद्धि को इस यौगिक के कुशल इस्तेमाल और खनिजों व पानी की प्रतिक्रियाओं से मिली ऊर्जा से जोड़ा। यह प्रदर्शन दोहराई गई दशाओं और प्रयोगों के दिनों तक सीमित है; भूवैज्ञानिक समयमानों पर जीव की वृद्धि या चयापचय जारी रहने का परीक्षण नहीं किया गया।
मुख्य बिंदु
- पृथ्वी का एक आर्किया एन्सेलाडस जैसी दशाओं वाले मिश्रण में pH 11 तक बढ़ा; बहुत क्षारीय और कम कार्बन डाइऑक्साइड वाले प्रयोगशाला माध्यम में वृद्धि नहीं हुई।
- कार्बन को कार्बनिक पदार्थ में शामिल करने वाले मार्ग की अभिव्यक्ति ने कोशिकाओं को प्रयोग में उपलब्ध थोड़ी-सी कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग करने में मदद की।
- नतीजा दिखाता है कि कई दिनों के प्रयोग में खनिज, पानी और हाइड्रोजन का संयोजन अत्यधिक क्षारीय रसायन को इस चयापचय के अनुकूल बना सकता है।

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