Science to Supersize Understanding

बुध की छिपी भू-आकृतियों ने ग्रह के सिकुड़ने का अनुमान बढ़ाया

स्थलाकृति के मानचित्र बताते हैं कि ऊबड़-खाबड़ सतह संकुचन के कुछ निशान छिपा देती है। नया आकलन ग्रह के कुल ऐतिहासिक संकुचन का है, आज उसकी गति बढ़ने का नहीं।

Disco de Mercúrio com crateras e parte da superfície na sombra, fotografado pela sonda MESSENGER em 2008.
चित्र: NASA/Johns Hopkins University Applied Physics Laboratory/Carnegie Institution of Washington — fotografia da MESSENGER.

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SUPER SCI-Z संपादकीय विश्लेषण

कोई ग्रह कितना सिकुड़ा है, इसका अनुमान इस बात पर निर्भर हो सकता है कि उसकी सतह पर सिकुड़ने के कितने निशान बचे हैं। बुध का अंदरूनी भाग ठंडा होता है तो बाहरी चट्टानी परतें दबती हैं और लंबी उभरी आकृतियाँ तथा कगार बनाती हैं। कगार यहाँ चट्टानों के खिसकने से बने जमीन के सीढ़ीनुमा हिस्से हैं। गाकु निशियामा और उनके सहकर्मियों ने पूछा कि क्या केवल दिखाई देने वाली संरचनाओं को गिनने से इस इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा छूट जाता है।

10 सितंबर को Geophysical Research Letters में प्रकाशित अध्ययन ने बुध की सतह की ऊबड़-खाबड़ बनावट के वैश्विक मानचित्र की तुलना दबाव से बनी संरचनाओं और उनसे निकाले गए संकुचन के मानचित्रों से की। यहाँ ऊबड़-खाबड़पन का अर्थ छोटी दूरी में स्थलाकृति का बदलना है, पत्थर को छूने पर महसूस होने वाला खुरदरापन नहीं। टीम ने अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के MESSENGER मिशन के आँकड़ों से जाँचा कि क्या अधिक असमतल इलाकों में सिकुड़ने के कम निशान पहचाने गए थे।

तुलना में ठीक यही पैटर्न मिला: सबसे ऊबड़-खाबड़ क्षेत्रों में सूचीबद्ध संपीड़न संरचनाएँ कम हैं। टक्कर से बने गड्ढों से बाहर फेंका गया पदार्थ पुरानी कगारों को ढक सकता है या उनकी पहचान कठिन बना सकता है। राखमानिनोव गड्ढे के आसपास टक्कर से जमा पदार्थ उन्हीं क्षेत्रों में मिलता है जहाँ ऐसी संरचनाएँ कम दिखाई देती हैं। यह परिणाम इस व्याख्या का समर्थन करता है कि कुछ अभिलेख छिपे हुए हैं; इसका अर्थ प्रत्येक दबी हुई भ्रंश-रेखा को सीधे देख लेना नहीं है।

शोधकर्ताओं ने सतह की बनावट और दिखाई देने वाली संरचनाओं के संबंध से वैश्विक अनुमान सुधारा। सभी संरचनाओं को वैश्विक शीतलन से जोड़ने वाले जिस अनुमान को होक्काइडो विश्वविद्यालय ने जारी किया, उसमें त्रिज्या का संकुचन 8.3 से बढ़कर 11.6 किलोमीटर होता है। त्रिज्या केंद्र से सतह तक की दूरी है; इस अनुमान में व्यास का संबंधित अंतर 23.2 किलोमीटर होगा। ये लंबे भूवैज्ञानिक विकास के संचित परिणाम का पुनर्निर्माण हैं, न कि दो हालिया तस्वीरों के बीच मापा गया बदलाव या अगले कुछ वर्षों में ग्रह कितना छोटा होगा इसकी भविष्यवाणी।

संकुचन की मात्रा बुध के भीतर की संरचना के मॉडलों को परखने में मदद करती है। क्रोड की अलग-अलग रासायनिक बनावट और ऊष्मा खोने के अलग इतिहास आकार में अलग कमी पैदा कर सकते हैं। सतही अभिलेख के संभवतः छूटे हिस्से को शामिल करके अध्ययन उन सीमाओं को बदलता है जिन्हें मॉडलों को पूरा करना होगा; वह अकेले ग्रह की संरचना या शुरुआती तापमान तय नहीं करता। 12 सितंबर को 404 Media में प्रकाशित बेकी फरेरा का स्वतंत्र विश्लेषण भी परिणाम को भूवैज्ञानिक अतीत के संशोधित आकलन के रूप में रखता है।

अगली कसौटी छोटी संरचनाएँ तलाशना और टक्करों के प्रभाव को बेहतर ढंग से अलग करना है। यूरोप-जापान के संयुक्त BepiColombo मिशन का BELA लेजर ऊँचाईमापी अधिक महीन पैमाने पर स्थलाकृति मापेगा। उससे मिलने वाले आँकड़े दिखा सकते हैं कि वर्तमान सुधार छिपे हुए हिस्से को सही तरह से शामिल करता है या नहीं। फिलहाल योगदान एक प्रेक्षणगत पक्षपात को स्पष्ट करना है: जिस जमीन पर कम निशान पहचाने गए हों, जरूरी नहीं कि वहाँ संकुचन भी कम हुआ हो।

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मुख्य बिंदु

  • बुध के अधिक ऊबड़-खाबड़ क्षेत्रों के मानचित्रों में कम संपीड़न संरचनाएँ पहचानी गई हैं।
  • अध्ययन में बताए गए एक सुधार से त्रिज्या के संकुचन का अनुमान 8.3 से 11.6 किलोमीटर हो जाता है।
  • परिणाम ग्रह के भूवैज्ञानिक इतिहास का आकलन बदलता है; यह नहीं दिखाता कि बुध आज अधिक तेजी से सिकुड़ रहा है।
मुख्य स्रोतHokkaido University

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